8.3 IMDb रेटिंग वाली कोर्टरूम ड्रामा फिल्म, तगड़ी है 2 घंटे 43 मिनट की कहानी, इस ओटीटी पर मौजूद

8.3 IMDb रेटिंग वाली कोर्टरूम ड्रामा फिल्म, तगड़ी है 2 घंटे 43 मिनट की कहानी, इस ओटीटी पर मौजूद

अगर आप नेटफ्लिक्स पर एक दमदार साउथ फिल्म देखने का मन बना रहे हैं, तो ‘सालार’ में प्रभास के दोस्त के रोल में नजर आए पृथ्वीराज सुकुमारन की यह फिल्म जरूर आपकी लिस्ट में होनी चाहिए। नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही यह कोर्टरूम ड्रामा फिल्म IMDb पर 8.3 की शानदार रेटिंग हासिल कर चुकी है। खास बात यह है कि फिल्म की शुरुआत एक तेज़ क्राइम थ्रिलर की तरह होती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते एक गहरे और असरदार कोर्टरूम ड्रामा में बदल जाती है।

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फिल्म की कहानी

इस फिल्म का नाम ‘जन गण मन’ है। कहानी की शुरुआत एक कॉलेज प्रोफेसर की हत्या से होती है, जिसके बाद पूरे इलाके में गुस्सा और विरोध प्रदर्शन फैल जाते हैं। जनता को तुरंत इंसाफ चाहिए होता है और इसी दबाव में पुलिस अधिकारी (सूरज वेंजारामूडु) कथित आरोपियों का एनकाउंटर कर देता है। इस घटना के बाद उसे समाज और मीडिया एक हीरो के तौर पर पेश करने लगते हैं। लेकिन कहानी उस वक्त करवट लेती है, जब अदालत में वकील अरविंद स्वामी के रूप में पृथ्वीराज सुकुमारन की एंट्री होती है। वह इस एनकाउंटर और पूरे सिस्टम की सच्चाई को एक-एक परत खोलकर सामने रख देता है।

फिल्म की खासियत

फिल्म का पहला हिस्सा भावनाओं को झकझोर देता है, जबकि दूसरा हिस्सा दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है। यह कहानी साफ तौर पर यह संदेश देती है कि जो हमें दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वही पूरी सच्चाई हो। फिल्म जातिवाद, मीडिया द्वारा चलाए जाने वाले ट्रायल, चुनावी राजनीति और तुरंत न्याय पाने की लोगों की बेचैनी जैसे मुद्दों पर तीखा सवाल उठाती है। खासकर कोर्टरूम के सीन में पृथ्वीराज सुकुमारन के डायलॉग्स और उनकी दमदार अदायगी फिल्म को अलग लेवल पर ले जाती है और कई जगह रोंगटे खड़े कर देती है।

‘जन गण मन’ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह दर्शकों की सोच का नजरिया बदल देती है। फिल्म के बीच में जिन फैसलों और घटनाओं पर आप तालियां बजा रहे होते हैं, वही चीजें अंत तक आते-आते आपको असहज कर देती हैं। निर्देशक इस तरह कहानी पेश करता है कि एक आम दर्शक खुद से सवाल करने लगता है और भीड़ की मानसिकता से निकलकर एक जागरूक नागरिक की तरह सोचने पर मजबूर हो जाता है।

एक बार ज़रूर देखें

हालांकि फिल्म पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। इसकी लंबाई थोड़ी ज्यादा महसूस हो सकती है और कुछ सीन जरूरत से ज्यादा खींचे हुए लगते हैं। इसके अलावा कुछ जगहों पर कोर्टरूम ड्रामा थोड़ा ज्यादा नाटकीय और तेज़ लग सकता है, जो हर दर्शक के टेस्ट के मुताबिक न भी हो। इसके बावजूद, मजबूत कहानी और शानदार अभिनय इसे एक बार जरूर देखने लायक बना देते हैं।

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Faiza Parveen

Faiza Parveen

फाईज़ा परवीन डिजिट हिंदी में एक कॉपी एडिटर हैं। वह 2023 से डिजिट में काम कर रही हैं और इससे पहले वह 6 महीने डिजिट में फ्रीलांसर जर्नलिस्ट के तौर पर भी काम कर चुकी हैं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं, और उनके पसंदीदा तकनीकी विषयों में स्मार्टफोन, टेलिकॉम और ओटीटी शामिल हैं। उन्हें हमारे हिंदी पाठकों को वेब पर किसी डिवाइस या सेवा का उपयोग करने का तरीका सीखने में मदद करने के लिए लेख लिखने में आनंद आता है। सोशल मीडिया की दीवानी फाईज़ा को अक्सर अपने छोटे वीडियो की लत के कारण स्क्रॉलिंग करते हुए देखा जाता है। वह थ्रिलर फ्लिक्स देखना भी काफी पसंद करती हैं। View Full Profile

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