भारत में वीडियो गेम्स: यात्रा अब तक
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भारत में वीडियो गेम्स: यात्रा अब तक

Team Digit  | पब्लिश किया गया 01 Dec 2014

बचपन में वीडियो गेम्स खेलना हम सबको पसंद रहा है यह हम सभी मानते हैं। हममें से कई तो बड़े हो जाने बावजूद आज भी वीडियो गेम्स का प्रति अपना प्रेम छोड़ नहीं पाए हैं। हम मानते हैं कि कुछ पसंद कभी नहीं बदलते।

आप मानें या न मानें लेकिन आज हालात बदल रहे हैं और ये बदलाव बहुत सकारात्मक हैं। लेकिन इस खबर से पहले आइए इतिहास का थोड़ा मुआयना करते हैं कि नब्बे के दशक में गेमिंग के प्रति हमारे भारत का नजरिया क्या था। 1991 में आर्थिक उदारीकरण से वीडियो गेमिंग की भारत में बहुत अधिक पहचान नहीं थी। अस्सी के दशक में कुछ ही बच्चे होंगे जिन्हें वीडियो गेम्स खेलने का मौका मिल पाता था और ये भी वे बच्चे थे जिनके कोई रिलेटिव विदेश में रहते हों या समय-समय पर विदेश दौरा पर जाते हों। 

नब्बे के दशक से 2000 तक कंप्यूटर क्रांति जोरों पर थी। इनमें ज्यादातर बच्चे जो अपने मां-बाप को कंप्यूटर खरीदने के लिए मनाते थे उनकी कंप्यूटर की चाह भी इसपर खेले जा सकने वाले गेम्स के लिए ही था। हालांकि बच्चों का इसपर ज्यादा समय बिताने को मां-बाप वक्त की बर्बादी समझते थे लेकिन ज्यादातर घरों की यही स्थिति थी। अनिच्छा से ही सही लेकिन धीरे-धीरे यह ज्यादातर घरों की जरूरत में शामिल होने लगा था।

ऐसे में जैसे ही इंटरनेट ने अपने पैर पसारे इसके लिए असीमित दरवाजे खुल गए। पायरेटेड गेम्स का  बाजार फैलने लगा क्योंकि ऑरिजनल गेम्स अभी भी बहुत महंगे थे और इसके लिए बड़ी कीमत चुकाने के लिए अभी भी हम बहुत ज्यादा तैयार नहीं थे, ज्यादातर मध्यमवर्गीय घरों के लिए यह उनकी पहुंच से बाहर था। 

आराम हमेशा प्राथमिकता होती है

इसके बाद अचानक टेलिकॉम सेक्टर ने भारत में उड़ान भरी और इसके साथ ही कंप्यूटर के बाद स्मार्टफोन आवश्यक जरूरतों में शामिल हो गया। आराम से घरों में बैठे हुए गेम्स खेलना लोगों के लिए यह उनका पसंदीदा टाइम-पास बनने लगा। 2007 में स्टीव जॉब्स ने जैसे ही आइफोन लॉन्च किया, मोबाइल फोन इंडस्ट्री की लगभग पूरी रणनीति बदल गई। कैजुअल गेम्स पूरे विश्व में सबसे अधिक पसंदीदा गेम बन गया और उससे कहीं ज्यादा भारत में जहां आज टॉयलेट से ज्यादा शायद मोबाइल फोन होंगे।

भारतीय संदर्भ में कैजुअल गेमिंग का प्रसार खासा महत्व रखता है। भारत में इसके प्रसार में हुई शुरुआती गड़बड़ियों के कारण है जिसमें न सिर्फ गेम खेलना था बल्कि गेम बनने भी शुरू हो गए। ऐसा आईटी सेक्टर से हुआ। बड़ी भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों ने अपनी ग्लोबल पहुंच बनानी शुरू की और इसके साथ ही आउटसोर्सिंग इसके लिए लाभप्रद सिद्ध होने लगा। इसी वक्त भारतीय गेम डिजाइन स्टुडियो के पास आउटसोर्स प्रोजेक्ट्स के काम आने लगे। नब्बे के दशक के अंत से शुरू हुआ यह ट्रेंड आज भी चल रहा है जिसमें आर्ट डिजाइन, मॉडल डिजाइन और दूसरे एनिमेशन प्रोजेक्ट्स कभी भारतीय नामों के साथ तो कभी एएए की गेम टाइटल (AAA gaming titles) के साथ बनाए और बेचे जाने लगे।

उसी समय मोबाइल फोन के बढ़ते बाजार ने गेम स्टूडियोज को फोन आधारित गेम्स बनाने की तरफ आकर्षित किया। विशाल गोंडाल ने इंडियन गेम्स की स्थपाना करते हुए मोबाइल फोन आधारित कई गेम्स बनाए और बहुत जल्दी भारत के ‘पहले गेम डेवलपर करोड़पति’ बन गए। जाहिर है इसने बाजार को आगे की संभावनाएं बताईं और यह आज भी बढ़ रहा है।

वर्तमान स्थिति

इस साल की शुरुआत में आई नासकॉम (NASSCOM) डाटा के अनुसार भारत में आज एक हजार से भी ज्यादा गेम डेवलेपमेंट स्टुडियोज हैं जो आत्मनिर्भर रूप से चल रहे हैं। यूबिसॉप्फ्ट, ईए, डिज्नी, जिंगा जैसे इंट्रनेशनल स्टूडियोज तो पहले से ही यहां हैं लेकिन इसके अलावे भी बड़ी संख्या में इंटरनेशल स्टुडियोज यहां अपने शाखाएं खोल रहे हैं। कई और आने वाले हैं? लेकिन क्यों? इसलिए क्योंकि आ गेमिंग केवल कुछ लोगों की पसंद से बाहर निकलकर मुख्यधारा में शामिल होने लगा है। यह सिर्फ बड़े बच्चों की पसंद से भी बाहर निकलकर घर में रहने वाली आंटी, रिटायर्ड दादाजी से लेकर बहुत छोटे किड्स की भी पसंद बनने लगे हैं। इसके साथ ही चाइना के बाद भारत में गेम डेवलप करने की क्षमता वाले टैलेंट के साथ ही गेम खेलने वालों की संख्या भी विश्व के किसी भी देश के मुकाबले बहुत ज्यादा है।

इस तरह पिछले 20 सालों में गेमिंग के बाजार में पायरेट करने वाले की छवि से निकलकर क्वालिटी गेम्स बनाने वाले की इसने अपनी एक गरिमामय छवि बनाई है।

गेमिंग इंडस्ट्री में 5000 से भी कम लोग हैं? एक बार को इसपर सोचिए कि आखिर कितना बड़ा ही था तब यह गेमिंग इंडस्ट्री? फिक्की-केपीएमजी (FICCI-KPMG) इंडियन मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री रिपोर्ट 2012 के अनुसार भारतीय गेम्स का बाजार लगभग 275 मिलियन डॉलर का आंका गया गया जो 2011 के मुकाबले 30 प्रतिशत ज्यादा था। फिक्की-केपीएमजी (FICCI-KPMG) इंडियन मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री रिपोर्ट 2013 के अनुसार पिछले साल वीडियो गेम्स इंदस्ट्री में 16 प्रतिशत की बढ़त हुई है जिसकी कुल कमाई 1500 करोड़ तक बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार 2017 तक भारत में गेम्स इंडस्ट्री 22% (4000 करोड़) तक की बढ़त पा लेगी।

बहुत हद तक स्थिति व्यवस्थिति हो चुकी है

स्थिति अब साफ हो चुकी है जिसमें यह भी स्पष्ट है कि अब गेमिंग छोटे या बड़े बच्चों की पसंद से कहीं आगे बढ़ चुका है। बड़े स्तर पर इसमें हो रहा निवेश साफ जाहिर करता है कि यंग प्रोफेशनल्स और रितायर्ड सीनियर्स के लिए किस हद तक एंटरटेनमेंट का हिस्सा बन चुका है। यंगे जेन को इसे कॅरियर के रूप में अपनाने के लिए भी इसके गेन्म डिजाइन एडुकेशन सेंटर्स भी खुल गए हैं। गेमिंग शिक्षा को उद्येश्य बनाकर खुला पुणे का डीएसके इंटरनेशनल कैंपस इसका सबसे बडा उदाहर है। गेमिंग अब यूनिवर्सिटी के सिलेबस में भी शामिल हो चुका है। किसी ने सोचा था कि ऐसा भी एक दिन हो सकता है? 

अब जब एक बड़ा गेम लवर वर्ग तैयार है ऐसे में भारतीय उपभोक्ताओं के लिए भारतीय गेम्स डिजाइन और डेवलप करने की चुनौती कौन पूरी कर पाता है यह एक बड़ा प्रशन है। इस विकास भी जो भी लोग सहयोगी रहे हैं वह जरूर इसके आगे एक बड़ा विकास देखना चाहते हैं।

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