Fake Website और App की पहचान कैसे करें? 10 पॉइंट्स में जानें तरीका, बाल भी बांका नहीं कर पाएंगे स्कैमर्स

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आज के समय में इंटरनेट स्कैम पहले से कहीं ज्यादा एडवांस हो चुके हैं। साइबर अपराधी ऐसी वेबसाइट और मोबाइल ऐप तैयार कर रहे हैं, जो देखने में बिल्कुल असली प्लेटफॉर्म जैसे लगते हैं। इनका मकसद यूजर्स से पासवर्ड, बैंकिंग डिटेल्स, ओटीपी या दूसरी निजी जानकारी हासिल करना होता है। कई बार सिर्फ एक गलत लिंक पर क्लिक करने से भी आर्थिक नुकसान, पहचान की चोरी या डेटा लीक जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

हालांकि, कुछ आसान संकेतों पर ध्यान देकर फर्जी वेबसाइट और ऐप की पहचान की जा सकती है। अगर आप URL, ऐप परमिशन, डिजाइन और अन्य जरूरी बातों की जांच करें, तो साइबर ठगी का शिकार होने की संभावना काफी कम हो जाती है। आइए जानते हैं कि नकली वेबसाइट और ऐप की पहचान कैसे करें।

फर्जी वेबसाइट की पहचान कैसे करें?

ब्रांड का डोमेन नेम अलग होना

सबसे पहले वेबसाइट के URL को ध्यान से देखें। कई बार स्कैमर्स किसी लोकप्रिय कंपनी के नाम से मिलता-जुलता डोमेन इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, “flipkart-offers.in” या “amazon-sale.co.in” जैसी वेबसाइटें असली Flipkart या Amazon की नहीं होतीं। ऐसे मिलते-जुलते डोमेन का इस्तेमाल यूजर्स का भरोसा जीतने के लिए किया जाता है।

वेबसाइट पर भाषा और स्पेलिंग की गलतियां

बड़ी कंपनियां अपनी वेबसाइट पर प्रोफेशनल कंटेंट और डिजाइन का इस्तेमाल करती हैं। अगर किसी वेबसाइट पर बार-बार स्पेलिंग की गलतियां, खराब व्याकरण या कम क्वालिटी वाले ग्राफिक्स दिखाई दें, तो यह संकेत हो सकता है कि वेबसाइट जल्दबाजी में बनाई गई है और भरोसेमंद नहीं है।

HTTPS सुरक्षा मौजूद न होना

वेबसाइट खोलते समय यह जरूर देखें कि URL “https://” से शुरू हो रहा है या नहीं। अगर वेबसाइट पर SSL सुरक्षा नहीं है या ब्राउजर सुरक्षा चेतावनी दिखा रहा है, तो उस साइट पर संवेदनशील जानकारी साझा करने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में लॉगिन या कार्ड से जुड़ी जानकारी गलत हाथों में पहुंच सकती है।

जरूरत से ज्यादा आकर्षक ऑफर

अगर किसी वेबसाइट पर महंगे ब्रांड या इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट बेहद कम कीमत पर मिल रहे हों, तो सावधान रहने की जरूरत है। बहुत ज्यादा सस्ते ऑफर कई बार यूजर्स को जल्दबाजी में भुगतान कराने के लिए दिखाए जाते हैं।

फर्जी काउंटडाउन या जल्दी खरीदने का दबाव

कुछ वेबसाइटें “only 1 left” या लगातार रीसेट होने वाले काउंटडाउन टाइमर दिखाती हैं। ऐसे मैसेज यूजर पर तुरंत फैसला लेने का दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, ताकि वह ऑफर की सच्चाई जांचने का समय न ले।

कंपनी की जानकारी उपलब्ध न होना

अगर वेबसाइट पर ऑफिस का पता, कस्टमर केयर नंबर या रजिस्टर्ड बिजनेस की जानकारी नहीं दी गई है, तो सतर्क रहें। इसके अलावा अगर संपर्क के लिए Gmail, Yahoo या Hotmail जैसी फ्री ईमेल सेवा का इस्तेमाल किया गया हो, तो यह भी शक करने की वजह हो सकती है।

फर्जी ऐप की पहचान कैसे करें?

ऐप की परमिशन ध्यान से जांचें

Google Play Store से कोई भी ऐप डाउनलोड करने से पहले उसकी मांगी गई परमिशन जरूर देखें। अगर कोई सामान्य शॉपिंग या यूटिलिटी ऐप कॉन्टैक्ट्स, कॉल लॉग या फोन स्टेटस जैसा गैर-ज़रूरी एक्सेस मांग रहा है, तो उसे डाउनलोड करने से बचना बेहतर होगा। जरूरत से ज्यादा परमिशन मांगना डेटा चोरी का संकेत हो सकता है।

रिव्यू पढ़ें, लेकिन आंख बंद करके भरोसा न करें

सिर्फ ज्यादा स्टार रेटिंग देखकर किसी ऐप को सुरक्षित मान लेना सही नहीं है। कई बार फर्जी या खरीदे गए रिव्यू भी पोस्ट किए जाते हैं। ऐसे में यूजर्स के डिटेल्ड रिव्यूज़ पढ़ें और देखें कि कहीं ऐप को लेकर धोखाधड़ी, जरूरत से ज्यादा विज्ञापन या संदिग्ध व्यवहार की शिकायतें तो नहीं हैं। साथ ही यह भी देखें कि डेवलपर यूजर्स की समस्याओं का जवाब देता है या नहीं।

डाउनलोड और रिव्यू का रेश्यो देखें

किसी ऐप के लाखों डाउनलोड होने का मतलब यह नहीं कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। अगर किसी ऐप के डाउनलोड बहुत ज्यादा हों लेकिन उसके मुकाबले रिव्यू बेहद कम दिखाई दें, तो यह असामान्य स्थिति हो सकती है। ऐसे मामलों में डाउनलोड नंबर्स की सच्चाई पर सवाल उठ सकते हैं।

ऐप कितना पुराना है, यह भी देखें

नए लॉन्च हुए ऐप्स को लंबे समय तक यूजर्स द्वारा टेस्ट नहीं किया गया होता। कुछ मैलीशियस ऐप शुरुआती दिनों में सामान्य तरीके से काम करते हैं और बाद में नुकसान पहुंचाना शुरू करते हैं। अगर ऐप जरूरी न हो, तो कुछ समय इंतजार करके उसके रिव्यू और रेटिंग में होने वाले बदलाव देखना बेहतर विकल्प हो सकता है।

Google Play Protect हमेशा चालू रखें

Android स्मार्टफोन में मिलने वाला Google Play Protect सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण सुविधा है। यह ऐप इंस्टॉल करने से पहले उसकी जांच करता है और समय-समय पर फोन में मौजूद ऐप्स को भी स्कैन करता रहता है ताकि किसी संभावित मालवेयर का पता लगाया जा सके। अतिरिक्त सुरक्षा के लिए किसी भरोसेमंद मोबाइल एंटीवायरस ऐप का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

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Faiza

फाईज़ा परवीन डिजिट हिंदी में एक कॉपी एडिटर हैं। वह 2023 से डिजिट में काम कर रही हैं और इससे पहले वह 6 महीने डिजिट में फ्रीलांसर जर्नलिस्ट के तौर पर भी काम कर चुकी हैं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं, और उनके पसंदीदा तकनीकी विषयों में स्मार्टफोन, टेलिकॉम और ओटीटी शामिल हैं। उन्हें हमारे हिंदी पाठकों को वेब पर किसी डिवाइस या सेवा का उपयोग करने का तरीका सीखने में मदद करने के लिए लेख लिखने में आनंद आता है। सोशल मीडिया की दीवानी फाईज़ा को अक्सर अपने छोटे वीडियो की लत के कारण स्क्रॉलिंग करते हुए देखा जाता है। वह थ्रिलर फ्लिक्स देखना भी काफी पसंद करती हैं।

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