खेती का तरीका तेजी से बदल रहा है। खेत में ट्रैक्टर और मशीनों के साथ अब सैटेलाइट, डिजिटल मैपिंग, डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी टेक्नोलॉजी की भूमिका भी बढ़ रही है। इसी दिशा में BRICS देशों ने 2026 में डिजिटल कृषि को लेकर एक अहम कदम उठाया है। इसका नाम BRICS Network on Digital Agriculture है। इस नेटवर्क के जरिए BRICS देश कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली डिजिटल टेक्नोलॉजी, रिसर्च, डेटा और अपने अनुभवों को साझा करेंगे। इसका उद्देश्य ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देना है, जिन्हें खेती की वास्तविक जरूरतों के साथ जोड़ा जा सके।
गौरतलब है कि इस नेटवर्क की शुरुआत पूरी तरह सितंबर 2026 के BRICS Summit में नहीं हुई थी। जून 2026 में इंदौर में हुई BRICS Agriculture Ministers’ Meeting में इसे स्थापित करने पर सहमति बनी थी। इसके बाद 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS सम्मलेन की New Delhi Declaration में नेटवर्क की स्थापना का स्वागत किया गया। इसके शुरुआती समन्वय की जिम्मेदारी IIT Delhi को दी गई है।
सीधे शब्दों में कहें तो यह BRICS देशों के बीच डिजिटल खेती को लेकर सहयोग का एक प्लेटफॉर्म है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजीज़, डिजिटल सार्वजानिक ढांचा और डेटा-आधारित कृषि समाधान जैसे क्षेत्रों पर काम किया जाएगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि BRICS देशों के किसानों के लिए कोई एक नया ऐप लॉन्च किया जा रहा है। इस नेटवर्क का बड़ा उद्देश्य अलग-अलग देशों में इस्तेमाल हो रही तकनीकों और उनके अनुभवों को एक-दूसरे के साथ साझा करना है। किसी देश में अगर सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल फसल की निगरानी के लिए किया जा रहा है या किसी दूसरे देश में डिजिटल सिस्टम के जरिए किसानों तक कृषि संबंधी जानकारी पहुंचाई जा रही है, तो ऐसे अनुभवों से दूसरे BRICS देश भी सीख सकते हैं।
18वें BRICS शिखर सम्मेलन 2026 में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किसान कल्याण से जुड़ी ब्रिक्स नेटवर्क ऑन डिजिटल एग्रीकल्चर और एग्रो इकोलॉजी और री जनरेटिव एग्रीकल्चर के सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस जैसी महत्वपूर्ण पहलों का उल्लेख किया।
— Agriculture INDIA (@AgriGoI) September 13, 2026
माननीय प्रधानमंत्री ने बताया कि नेटवर्क… pic.twitter.com/7R4xRF4XiH
Digital Agriculture का सबसे बड़ा फायदा यह है कि खेती से जुड़े फैसलों में ज्यादा डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है। मौसम का डेटा, मिट्टी की जानकारी, फसल की स्थिति, पानी की उपलब्धता और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड जैसे अलग-अलग डेटा को एक साथ इस्तेमाल करके खेती को ज्यादा व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए सैटेलाइट इमेजिंग की मदद से बड़े कृषि क्षेत्रों पर नजर रखी जा सकती है। इससे फसल क्षेत्र, जमीन की स्थिति या मौसम से होने वाले प्रभावों का आकलन करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह AI आधारित सिस्टम, कृषि डेटा का विश्लेषण करके फसल प्रबंधन से जुड़े सुझाव देने में मदद कर सकते हैं।
BRICS Digital Agriculture Network में Geospatial Technology को खास महत्व दिया गया है। यह ऐसी तकनीक है जिसमें किसी जगह से जुड़ी भौगोलिक जानकारी को डिजिटल तरीके से समझा और इस्तेमाल किया जाता है। खेती में इसका इस्तेमाल खेतों की मैपिंग, फसल क्षेत्र की पहचान, जमीन की निगरानी और प्राकृतिक परिस्थितियों के आकलन जैसे कामों में किया जा सकता है।
BRICS के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके सदस्य देशों की भौगोलिक और कृषि परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। कहीं सूखे की समस्या बड़ी है, कहीं बाढ़ और कहीं अलग तरह की जलवायु चुनौती बनी हुई है। ऐसे में अलग-अलग देशों के डिजिटल कृषि अनुभवों को साझा करना उपयोगी हो सकता है।
इस नेटवर्क में डिजिटल सार्वजानिक ढांचा भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत पहले से ही बड़े पैमाने पर डिजिटल सार्वजनिक ढांचे का इस्तेमाल कर रहा है। कृषि क्षेत्र में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किसान रजिस्ट्रेशन, कृषि रिकॉर्ड, सरकारी योजनाओं, मौसम की जानकारी और दूसरी सेवाओं को डिजिटल तरीके से उपलब्ध कराने के लिए किया जा सकता है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी BRICS देशों में भारत जैसा ही डिजिटल सिस्टम लागू किया जाएगा। हर देश अपनी जरूरत, कानून और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के हिसाब से सिस्टम विकसित करेगा। BRICS नेटवर्क का उद्देश्य इन अनुभवों के बीच सहयोग बढ़ाना है।
Digital Agriculture Network का दायरा केवल खेतों में उगाई जाने वाली फसलों तक सीमित नहीं है। New Delhi Declaration में कृषि वानिकी, मत्स्य पालन और जलीय कृषि को भी इसके दायरे में शामिल किया गया है। यानी डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल खेती के साथ-साथ मछली पालन, जल कृषि और कृषि-वनीकरण जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ाया जा सकता है।
इसका फोकस व्यापक कृषि और खाद्य प्रणालियों पर है, जहां डेटा और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल उत्पादन, संसाधन प्रबंधन और निगरानी को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है।
भारत के लिए इस पहल की खासियत यह है कि नेटवर्क के शुरुआती समन्वय की जिम्मेदारी IIT Delhi को दी गई है। इससे भारत के रिसर्च और अकैडमिक ईकोसिस्टम को BRICS देशों के कृषि-तकनीकी सहयोग में भूमिका मिलेगी। इसके अलावा 2026 में BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत ने कृषि को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा था। इसमें खाद्य सुरक्षा, कृषि व्यापर, जलवायु-आधारित कृषि और इनोवेशन जैसे मुद्दे शामिल रहे। Digital Agriculture Network इसी बड़े कृषि एजेंडे का तकनीकी हिस्सा है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस पहल से किसानों की लागत पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन इसका जवाब अभी निश्चित तौर पर नहीं दिया जा सकता। टेक्नोलॉजी को किसानों तक पहुंचाने के लिए बेहतर इंटरनेट, भरोसेमंद डेटा, स्थानीय भाषा में सेवाएं और आसान डिजिटल सिस्टम भी जरूरी होंगे। इन सभी विषयों पर स्पष्टता आने के बाद ही लागत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
खासकर छोटे और सीमांत किसानों तक इन तकनीकों की पहुंच बड़ी चुनौती रहेगी। अगर टेक्नोलॉजी केवल बड़े कृषि कारोबार या बेहतर डिजिटल सुविधाओं वाले किसानों तक सीमित रहती है, तो इसका असर भी सीमित हो सकता है। इसलिए इस नेटवर्क की असली सफलता इस बात से तय होगी कि BRICS देश इस तकनीक को रिसर्च लैब और सरकारी दस्तावेजों से निकालकर वास्तविक खेतों तक कितने प्रभावी तरीके से पहुंचाते हैं।
BRICS Digital Agriculture Network की घोषणा निश्चित तौर पर डिजिटल खेती की दिशा में एक बड़ा सहयोगी ढांचा तैयार करती है, लेकिन फिलहाल यह सिर्फ एक शुरुआत है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि BRICS देश कौन से संयुक्त प्रोजेक्ट शुरू करते हैं, किस तरह का कृषि डेटा साझा करते हैं और किसानों के लिए कौन से डिजिटल समाधान विकसित किए जाते हैं।
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