आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेज़ी से इसके दुरुपयोग की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया, साइबर अपराध और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर AI आधारित फर्जीवाड़े को रोकने के लिए केंद्र सरकार नए कानून पर विचार कर रही है। सरकार का मानना है कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था बदलती तकनीक से जुड़ी चुनौतियों का पूरी तरह समाधान करने में सक्षम नहीं है, इसलिए AI के लिए अलग कानूनी ढांचा तैयार करना जरूरी हो गया है।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव एस. कृष्णन ने बताया कि मौजूदा कानून डीपफेक और कंटेंट लेबलिंग जैसे मामलों से निपटने में कुछ हद तक सक्षम हैं, लेकिन AI से जुड़ी नई समस्याएं लगातार सामने आ रही हैं। इन्हीं कारणों से AI की सीमा तय करने के लिए नए कानून बनाने को लेकर विशेषज्ञों के साथ चर्चा जारी है।
AI मामलों के विशेषज्ञ संदीप बुदकी का कहना है कि अगर समय रहते AI को लेकर स्पष्ट कानून नहीं बनाए गए तो भविष्य में भारत को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। उनके अनुसार मौजूदा कानून इंसानों के व्यवहार को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, जबकि AI ऑटोमैटिक तौर पर फैसले लेने वाली तकनीक है। इसलिए इससे जुड़े कई कानूनी सवालों के स्पष्ट जवाब अभी उपलब्ध नहीं हैं।
AI सिस्टम किस आधार पर कोई फैसला लेते हैं, यह कई बार उनके डेवलपर्स के लिए भी पूरी तरह समझना आसान नहीं होता। इसे ‘ब्लैक बॉक्स’ समस्या कहा जाता है। अगर AI की वजह से कोई नुकसान होता है, तो जिम्मेदारी डेवलपर, यूज़र या किसी अन्य की होगी, इस पर मौजूदा कानून स्पष्ट नहीं हैं।
इसी तरह अगर AI आधारित मेडिकल रोबोट गलत ऑपरेशन कर दे या सेल्फ-ड्राइविंग वाहन दुर्घटना का कारण बन जाए, तो भारतीय दंड कानून किसी मशीन को दोषी नहीं ठहरा सकते। ऐसे मामलों के लिए अलग कानूनी प्रावधानों की ज़रूरत महसूस की जा रही है।
AI अब पेंटिंग, म्यूज़िक, लेख और कंप्यूटर कोड जैसा कंटेंट भी तैयार कर रहा है। लेकिन मौजूदा कॉपीराइट कानून केवल ह्यूमन क्रिएटर्स को ही मान्यता देते हैं। ऐसे में AI द्वारा तैयार किए गए कंटेंट का असली मालिक कौन होगा, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।
इसके अलावा AI मॉडल को ट्रेनिंग देने के लिए इंटरनेट से बड़ी मात्रा में कॉपीराइट कंटेंट बिना अनुमति के इस्तेमाल किए जाने को लेकर भी कानूनी विवाद बढ़ रहे हैं। वर्तमान नियम यह स्पष्ट नहीं करते कि किन परिस्थितियों में इसे सही इस्तेमाल माना जाएगा और कब यह कॉपीराइट उल्लंघन होगा।
AI की मदद से किसी व्यक्ति की आवाज या चेहरे की हूबहू नकल तैयार करना पहले से कहीं आसान हो गया है। इसका इस्तेमाल वित्तीय धोखाधड़ी, पहचान की चोरी और किसी व्यक्ति की छवि खराब करने वाले डीपफेक वीडियो बनाने में किया जा सकता है।
हालांकि IT कानून और मानहानि से जुड़े नियम मौजूद हैं, लेकिन डीपफेक कंटेंट इतनी तेजी से वायरल हो जाती है कि कानूनी कार्रवाई शुरू होने तक सामाजिक और राजनीतिक नुकसान हो चुका होता है।
फेशियल रिकॉग्निशन जैसी तकनीकों के जरिए सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा बड़े पैमाने पर निगरानी संभव हो गई है। भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा तो करता है, लेकिन AI द्वारा डेटा का विश्लेषण करके तैयार की जाने वाली प्रोफाइलिंग और उससे निकाले गए निष्कर्षों को पूरी तरह नियंत्रित नहीं करता। यही वजह है कि AI के लिए अलग और व्यापक कानूनी ढांचे की जरूरत पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है।