कभी लीक नहीं होंगी प्राइवेट फोटो-वीडियो..बहुत काम का है डिजिटल हैश, जान लीजिए कैसे करता है काम

डिजिटल दुनिया में प्राइवेसी को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं. खासकर निजी फोटो या वीडियो के गैर-सहमति से लीक होने की घटनाएं सामने आने के बाद सुरक्षा के नए तरीके विकसित किए जा रहे हैं. ऐसी ही एक तकनीक है डिजिटल हैशिंग, जिसे अब संवेदनशील कंटेंट को इंटरनेट पर अपलोड होने से रोकने के लिए प्रभावी उपाय माना जा रहा है.

भारत में Indian Cybercrime Coordination Centre ने लोगों से अपील की है कि अगर कोई व्यक्ति उनके निजी फोटो या वीडियो को सोशल मीडिया पर लीक करने की धमकी देता है, तो वे तुरंत उन फाइलों का डिजिटल हैश बना लें. इससे बिना असली फोटो या वीडियो साझा किए ही उन्हें ऑनलाइन फैलने से रोका जा सकता है.

क्या होता है डिजिटल हैश?

डिजिटल हैश को आसान भाषा में किसी फाइल का डिजिटल फिंगरप्रिंट कहा जा सकता है. यह एक निश्चित लंबाई की यूनिक कैरेक्टर स्ट्रिंग होती है जो किसी गणितीय एल्गोरिद्म जैसे SHA-256 के जरिए बनाई जाती है.

जिस तरह दो लोगों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते, उसी तरह दो अलग-अलग फाइलों का हैश भी कभी एक जैसा नहीं होता. इसलिए यह तकनीक किसी खास फोटो या वीडियो को पहचानने में बेहद सटीक मानी जाती है.

हैशिंग और एन्क्रिप्शन में बड़ा अंतर यह है कि एन्क्रिप्शन को बाद में डिक्रिप्ट किया जा सकता है, जबकि हैशिंग एक वन-वे प्रोसेस है. यानी किसी फोटो से हैश तो बनाया जा सकता है, लेकिन उस हैश से मूल फोटो दोबारा तैयार नहीं की जा सकती. यही कारण है कि यह तकनीक प्राइवेसी के लिहाज से काफी सुरक्षित मानी जाती है.

सोशल मीडिया कंपनियां ऐसे हैश को अपनी ब्लॉक लिस्ट में जोड़ देती हैं. इसके बाद अगर वही फोटो या वीडियो दोबारा अपलोड करने की कोशिश की जाती है, तो प्लेटफॉर्म उसे तुरंत पहचान कर ब्लॉक कर देता है, बिना असली फाइल देखे या स्टोर किए.

डिजिटल हैश कैसे बनाया जाता है?

आज कई अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म इस प्रक्रिया को आसान बना चुके हैं. उदाहरण के लिए StopNCII.org नाम का प्लेटफॉर्म इस सुविधा को उपलब्ध कराता है. इस प्लेटफॉर्म को Meta, TikTok और Google जैसी बड़ी टेक कंपनियों का समर्थन मिला हुआ है.

जब कोई यूजर StopNCII जैसे टूल के जरिए फोटो या वीडियो चुनता है, तो सबसे पहले उसी डिवाइस पर उस फाइल का हैश बनाया जाता है. यानी असली फोटो या वीडियो फोन या कंप्यूटर से बाहर नहीं जाता.

इसके बाद केवल उस फाइल से बना कैरेक्टर कोड यानी हैश ही डेटाबेस में जमा किया जाता है. सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर अपलोड होने वाले हर नए कंटेंट को इस डेटाबेस से मैच करती हैं. अगर कोई मैच मिलता है, तो उस कंटेंट को तुरंत ब्लॉक कर दिया जाता है और वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देता.

धमकी मिलने पर क्या करें?

Ministry of Home Affairs India के साइबर सुरक्षा हैंडल CyberDost ने ऐसे मामलों में लोगों के लिए कुछ जरूरी निर्देश जारी किए हैं. अगर किसी को निजी फोटो या वीडियो लीक करने की धमकी मिलती है, तो सबसे पहले उस बातचीत या धमकी के सबूत सुरक्षित रखें. इसमें स्क्रीनशॉट, मैसेज या आरोपी की प्रोफाइल जैसी जानकारी शामिल हो सकती है.

इसके बाद संबंधित फोटो या वीडियो का डिजिटल हैश बनाना चाहिए ताकि उसे सोशल मीडिया पर अपलोड होने से रोका जा सके. पीड़ित व्यक्ति को तुरंत भारत सरकार के आधिकारिक साइबरक्राइम पोर्टल www.cybercrime.gov.in
पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए.

भारत के आईटी नियमों के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को गैर-सहमति से साझा की गई निजी तस्वीरों या वीडियो को शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर हटाना होता है. सरकार ने यह भी सलाह दी है कि धमकी देने वाले व्यक्ति से किसी तरह की बातचीत या समझौता करने से बचें और किसी भी स्थिति में पैसे या फिरौती न दें, क्योंकि इससे अक्सर ब्लैकमेलिंग और बढ़ जाती है.

हैशिंग तकनीक क्यों महत्वपूर्ण?

डिजिटल हैशिंग केवल व्यक्तिगत सुरक्षा तक सीमित नहीं है. कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं. उदाहरण के लिए Internet Watch Foundation अवैध ऑनलाइन कंटेंट की पहचान करने और उसे हटाने के लिए बड़े पैमाने पर हैश लिस्ट का उपयोग करता है.

2026 तक यह तकनीक कई बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बीच एक साझा सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है. इसका मतलब है कि अगर किसी कंटेंट को एक प्लेटफॉर्म पर ब्लॉक कर दिया जाता है, तो अन्य प्लेटफॉर्म भी उसी हैश को पहचान कर उसे अपलोड होने से रोक सकते हैं.

डिजिटल हैशिंग की वजह से अब निजी फोटो और वीडियो के वायरल होने की संभावना पहले की तुलना में काफी कम हो गई है. यह तकनीक उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बनकर सामने आई है जो ऑनलाइन ब्लैकमेल या निजी कंटेंट लीक होने के खतरे का सामना कर रहे हैं.

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Sudhanshu Shubham

सुधांशु शुभम मीडिया में लगभग आधे दशक से सक्रिय हैं. टाइम्स नेटवर्क में आने से पहले वह न्यूज 18 और आजतक जैसी संस्थाओं के साथ काम कर चुके हैं. टेक में रूचि होने की वजह से आप टेक्नोलॉजी पर इनसे लंबी बात कर सकते हैं.

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