तेज गर्मी के दिनों में कई लोगों को लगता है कि अगर उनका एयर कंडीशनर लगातार चल रहा है लेकिन कमरा फिर भी पर्याप्त ठंडा नहीं हो रहा, तो शायद AC में कोई तकनीकी खराबी आ गई है। हालांकि, कई बार समस्या मशीन के अंदर नहीं बल्कि बाहर के मौसम में होती है। जब तापमान 44 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा पहुंच जाता है, तब AC की आउटडोर यूनिट को बहुत ज्यादा गर्म हवा के बीच काम करना पड़ता है। ऐसे में एक बाल्टी साधारण पानी अस्थायी रूप से इसकी एफिशिएंसी बढ़ाने में मदद कर सकता है। आइए जानते हैं कैसे…
एयर कंडीशनर के आउटडोर यूनिट का मुख्य काम कमरे के अंदर की गर्मी को बाहर निकालना होता है। लेकिन जब बाहरी तापमान बहुत ज्यादा हो जाता है, तब यूनिट के लिए उस गर्मी को बाहर की हवा में छोड़ना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में रेफ्रिजरेंट और आसपास की हवा के बीच तापमान का अंतर कम हो जाता है, जिससे हीट एक्सचेंज की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।
इस कारण AC को कमरे को ठंडा करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। कूलिंग की स्पीड कम हो जाती है और बिजली की खपत बढ़ने लगती है। इसका मतलब यह नहीं है कि AC खराब हो गया है, बल्कि वह बहुत ज्यादा गर्म मौसम से जूझ रहा होता है।
जब आउटडोर यूनिट की कंडेंसर कॉइल्स पर पानी डाला जाता है, तो वाष्पीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। पानी के भाप में बदलने के दौरान वह कॉइल्स की सतह से गर्मी को तेजी से खींच लेता है। कॉइल्स का तापमान कम होने पर रेफ्रिजरेंट ज्यादा प्रभावी तरीके से गर्मी बाहर निकाल पाता है। इससे कंप्रेसर पर दबाव कम पड़ता है और AC बेहतर एफिशिएंसी के साथ काम करने लगता है। इस तरह कमरे की कूलिंग तेज हो सकती है और बिजली की खपत में भी कुछ कमी देखने को मिल सकती है।
यह उपाय उन इलाकों में ज्यादा प्रभावी माना जाता है जहां गर्मी के साथ हवा तुलनात्मक रूप से शुष्क होती है। दिल्ली, जयपुर, नागपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों में पीक समर के दौरान इसका बेहतर प्रभाव देखने को मिल सकता है। वहीं मुंबई, चेन्नई जैसे ज्यादा नमी वाले शहरों में हवा पहले से ही नमी से भरी होती है। ऐसे वातावरण में पानी का वाष्पीकरण धीमा हो जाता है, इसलिए इस उपाय से मिलने वाला लाभ भी सीमित रह सकता है।
ध्यान रखें कि इसका असर स्थायी नहीं होता। जब तक पानी मौजूद रहता है और उसका वाष्पीकरण होता रहता है, तब तक ही इसका प्रभाव महसूस किया जा सकता है। इसे बहुत ज्यादा गर्म दिनों में AC के लिए अस्थायी राहत के रूप में देखा जा सकता है।
गर्मी के मौसम में सप्ताह में एक बार ऐसा करने से फायदा मिल सकता है। मार्च से जून के बीच भारतीय शहरों में धूल काफी ज्यादा होती है, इसलिए नियमित रूप से कॉइल्स की सफाई करने से जमा धूल और गंदगी भी हटती रहती है, जिससे यूनिट की एफिशिएंसी बेहतर बनी रहती है।
जब AC बहुत ज्यादा मेहनत करता है, तो वह केवल धीरे-धीरे कूलिंग नहीं करता बल्कि ज्यादा बिजली भी खपत करता है। कंप्रेसर को ज़रूरत के अनुसार तापमान हासिल करने के लिए लंबे समय तक लगातार चलना पड़ता है, जिससे बिजली की खपत बढ़ जाती है। मई और जून जैसे महीनों में अगर 1.5 टन का AC रोजाना 6 से 8 घंटे चलता है, तो यही अतिरिक्त लोड बिजली के बिल को काफी बढ़ा सकता है।
अगर कंडेंसर कॉइल्स का तापमान पानी की मदद से कुछ समय के लिए कम हो जाए, तो कंप्रेसर तुलनात्मक रूप से जल्दी अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है और जल्दी बंद हो सकता है। छोटे रनिंग साइकल का मतलब है कम बिजली की खपत।
पूरे सीजन में समय-समय पर ऐसा करने से बिजली के बिल में कोई चमत्कारी कमी नहीं आती, लेकिन कुछ हद तक बचत ज़रूर देखने को मिल सकती है। अगर कोई परिवार रोज़ाना लगभग आठ घंटे AC का इस्तेमाल करता है, तो कंप्रेसर के रन टाइम में 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी भी महीने के बिल पर असर डाल सकती है।
इसके अलावा एक अतिरिक्त फायदा यह है कि साफ कॉइल्स यूनिट पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ने देतीं। धूल और मलबा जमा रहने पर AC को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे समय के साथ उसकी एफिशिएंसी धीरे-धीरे कम होने लगती है। नियमित सफाई इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती है।
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