कई बार ऐसा होता है कि जो फिल्में सिनेमाघरों में दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पातीं, वही OTT पर रिलीज़ होते ही नई पहचान बना लेती हैं। ऐसा ही कुछ इस समय Netflix पर देखने को मिल रहा है, जहां एक करीब तीन महीने पुरानी फिल्म लगातार चर्चा में बनी हुई है। यह फिल्म बीते साल नवंबर में थिएटर में रिलीज़ हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर इसका प्रदर्शन इतना अच्छा नहीं रहा थाम जितना माना जा रहा था, लेकिन 2 जनवरी को जैसे ही इस फिल्म को स्ट्रीमिंग के लिए Netflix पर लाया गया, उसी समय से इस फिल्म ने एक नई दिशा में काम करना शुरू कर दिया और मानों इसकी जिंदगी ही पूरी तरह से बदल गई। 131 मिनट की यह फिल्म पिछले लगभग 12 दिनों से नेटफ्लिक्स की टॉप-5 ट्रेंडिंग लिस्ट में बनी हुई है, जो अपने आप में बड़ी बात मानी जा रही है।
यह फिल्म इसलिए भी खास बन जाती है क्योंकि इसकी कहानी किसी काल्पनिक ड्रामे पर नहीं, बल्कि एक सच्चे और ऐतिहासिक मामले से प्रेरित है। यहां बात हो रही है Haq की, जिसमें Yami Gautam और Emraan Hashmi मुख्य भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म एक ऐसी महिला की कहानी दिखाती है, जिसका पति दूसरी शादी कर लेता है और उसे तलाक दे देता है। इसके बाद यह मामला सिर्फ एक निजी संघर्ष नहीं रहता, बल्कि महिला अधिकार, धर्म और कानून के टकराव का प्रतीक बन जाता है, जो आगे चलकर राष्ट्रीय बहस का रूप ले लेता है।
असल ज़िंदगी में यह कहानी Shah Bano Begum के संघर्ष से जुड़ी हुई मानी जाती है। शाह बानो मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली थीं और उनकी शादी 1932 में मशहूर वकील Mohammed Ahmed Khan से हुई थी। इस शादी से उनके पांच बच्चे थे। करीब चार दशक तक साथ रहने के बाद 1978 में उनके पति ने उन्हें तलाक दे दिया और आर्थिक सहायता भी बंद कर दी। उम्र के उस पड़ाव पर, जब उनके पास आय का कोई साधन नहीं बचा था, शाह बानो ने इंदौर की एक स्थानीय अदालत का रुख किया और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ता मांगा, जो किसी भी बेसहारा महिला को आर्थिक सहायता का अधिकार देती है।
इस मांग को उनके पति ने चुनौती दी और यह तर्क दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक के बाद केवल इद्दत की अवधि, यानी लगभग तीन महीने तक ही भरण-पोषण दिया जा सकता है। मामला आगे बढ़ता हुआ Supreme Court of India तक पहुंचा और अप्रैल 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश Y. V. Chandrachud ने कहा कि धारा 125 सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है और किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर किसी महिला को बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता।
OTT पर रिलीज़ के बाद Haq को जिस तरह का रिस्पॉन्स मिल रहा है, वह यह साबित करता है कि डिजिटल दर्शक अब सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि सामाजिक और संवेदनशील कहानियों को भी अपनाने लगे हैं। बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहने के बावजूद Netflix पर इसका ट्रेंड करना इस बात का संकेत है कि कभी-कभी सही मंच मिलने पर कहानी खुद अपनी जगह बना लेती है। अगर आपको कोर्टरूम ड्रामा, सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में और महिला अधिकारों से जुड़े विषयों में रुचि है, तो यह फिल्म OTT पर एक गंभीर और असरदार अनुभव साबित हो सकती है।
यह भी पढ़ें: Dhurandhar On OTT: किस OTT पर और किस दिन आ रहा ‘धुरंधर’ से टक्कर लेने वाला ‘रहमान डकैत’.. देखें ये बड़ा अपडेट