Strait of Hormuz को लंबे समय से दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा चोकपॉइंट माना जाता रहा है. लेकिन मार्च 2026 में यह केवल तेल और गैस का रास्ता ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण डिजिटल चोकपॉइंट के रूप में भी उभर कर सामने आया है.
भारत के लिए यह संकीर्ण समुद्री मार्ग दोहरी चुनौती पेश करता है. एक तरफ यहीं से वह ईंधन आता है जो देश की अर्थव्यवस्था को चलाता है, वहीं दूसरी तरफ इसी क्षेत्र से गुजरने वाली समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलें भारत के डिजिटल नेटवर्क को दुनिया से जोड़ती हैं. पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण अब यह जोखिम केवल संभावित नहीं बल्कि वास्तविक खतरे में बदलता दिखाई दे रहा है.
दुनिया भर में लगभग 99 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रांसमिशन समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों के जरिए होता है. भारत के पश्चिम की ओर जाने वाले इंटरनेट ट्रैफिक का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है.
महत्वपूर्ण केबल सिस्टम जैसे SEA-ME-WE 4, I-ME-WE और FLAG FALCON भारत के मुंबई और चेन्नई को यूरोप तथा पश्चिम एशिया से जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं.
लेकिन क्षेत्र में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति ने इन केबलों के रखरखाव को प्रभावित किया है. 2025 के अंत में जेद्दा के पास केबल कटने के बाद से मरम्मत करने वाले जहाज सक्रिय थे, लेकिन अब मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण उन्हें काम रोकना पड़ा है.
इस स्थिति को विशेषज्ञ “repair paralysis” कह रहे हैं. इसका मतलब यह है कि अगर आज किसी केबल को नुकसान पहुंचता है, चाहे वह जहाज के एंकर से हो या जानबूझकर किए गए हमले से, तो उसे ठीक करने में लंबा समय लग सकता है. इससे भारत के रियल-टाइम फाइनेंशियल ट्रेडिंग सिस्टम और लगभग 270 अरब डॉलर के डेटा सेंटर उद्योग पर गंभीर असर पड़ सकता है.
यह समुद्री मार्ग भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. मार्च 2026 तक भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50 से 55 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से आता है. इसके अलावा देश के आधे से अधिक एलएनजी (Liquefied Natural Gas) शिपमेंट भी इसी मार्ग से गुजरते हैं.
जैसे-जैसे क्षेत्र में युद्ध तेज हो रहा है, टैंकरों की आवाजाही लगभग 70 प्रतिशत तक कम हो चुकी है. कई जहाज हमलों के डर से स्ट्रेट के बाहर ही रुक गए हैं.
एलएनजी आपूर्ति में रुकावट विशेष रूप से चिंता का विषय है क्योंकि Qatar भारत का सबसे बड़ा एलएनजी सप्लायर है. अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो भारत के उर्वरक और बिजली क्षेत्र की आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है.
सरकार का कहना है कि देश के पास लगभग 25 दिनों का कच्चे तेल और उतने ही समय का ईंधन भंडार मौजूद है, लेकिन यह केवल अस्थायी सुरक्षा कवच है. हाल ही में तेल टैंकर Skylight पर हुए हमले में दो भारतीय नाविकों की मौत के बाद समुद्री बीमा प्रीमियम भी तेजी से बढ़ गया है, जिससे हर आयातित तेल बैरल पर “war premium” जुड़ गया है.
इस संकट का असर केवल ऊर्जा कीमतों तक सीमित नहीं है. स्ट्रेट में तनाव बढ़ने के बाद Brent क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई है.
विश्लेषकों का मानना है कि अगर संकट लंबे समय तक जारी रहा तो भारतीय रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर से नीचे जा सकती है. इससे चालू खाता घाटा और बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है.
भारत के आईटी सेक्टर और रिमोट-वर्क मॉडल पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि डेटा फ्लो में रुकावट से कंपनियों की सेवाओं पर प्रभाव पड़ सकता है. साथ ही खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों की आर्थिक स्थिरता भी खतरे में पड़ सकती है. इन प्रवासी भारतीयों से आने वाला रेमिटेंस भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
इस संकट ने भारत को नई रणनीतिक दिशा पर विचार करने के लिए मजबूर किया है. अमेरिका ने भारत को 30 दिनों की छूट दी है ताकि वह रूस से अधिक तेल आयात कर सके और कीमतों के दबाव को कम किया जा सके. इसके साथ ही भारत अमेरिका और वेनेजुएला जैसे अन्य स्रोतों से भी तेल आयात बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
इसी संदर्भ में India Middle East Europe Economic Corridor जैसे प्रोजेक्ट्स का महत्व भी बढ़ गया है. पहले इसे केवल व्यापारिक परियोजना माना जाता था, लेकिन अब इसे ऐसे वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखा जा रहा है जो भविष्य में समुद्री संघर्ष क्षेत्रों को बायपास कर सकता है.
अंततः स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मौजूदा संकट यह दिखाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता केवल भू-राजनीतिक संतुलन पर नहीं बल्कि समुद्र के नीचे बिछी केबलों और दूरस्थ समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर भी निर्भर करती है.
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