क्या आपने वेब सीरीज ‘Mismatched 2’ का वह सीन देखा है, जहां प्राजक्ता कोली का किरदार एक ऐसा AI ऐप बनाता है जिससे मरे हुए लोगों की आवाज में बात की जा सकती है? उस वक्त यह सिर्फ एक भावुक कहानी लगी थी, लेकिन 2026 में यह हकीकत बन चुकी है. जरा सोचिए, अगर आपको किसी ऐसे व्यक्ति का फोन आए जो अब इस दुनिया में नहीं है, तो आपको कैसा लगेगा? सुकून मिलेगा या डर? इसे ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ (Digital Afterlife) कहा जा रहा है, लेकिन यह अपने साथ कानूनी और नैतिक सवालों का एक तूफान लेकर आया है.
नेटफ्लिक्स की सीरीज Mismatched 2 में एक संक्षिप्त क्षण ने उस सवाल को उठाया जो अब केवल काल्पनिक कथाओं तक सीमित नहीं है. एक दृश्य में, प्राजक्ता कोली (Prajakta Koli) और रोहित सराफ के पात्रों ने एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एप्लिकेशन का प्रदर्शन किया, जो यूजर्स को किसी मृत व्यक्ति की आवाज़ में संदेश प्राप्त करने और बातचीत करने में सक्षम बनाता है.
जो कभी अटकलें लगती थीं, अब 2026 की उभरती हुई वास्तविकता के रूप में चर्चा में है. टेक कंपनियां ऐसे टूल्स विकसित कर रही हैं जो किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी निरंतर बातचीत का वादा करती हैं.
द कन्वर्सेशन (The Conversation) की एक रिपोर्ट के अनुसार, रिसर्चर्स इसे “डिजिटल आफ्टरलाइफ” बता रहे हैं. अक्सर “Grief Tech” (शोक तकनीक) शब्द के तहत समूहीकृत, ये सिस्टम तथाकथित “डेथबॉट्स” या “डिजिटल ट्विन्स” पर निर्भर करते हैं. यह AI-संचालित रेप्लिका है जिसे किसी व्यक्ति के वॉयस नोट्स, वीडियो, फोटो, टेक्स्ट मैसेज और यादों पर प्रशिक्षित किया जाता है.
इसका परिणाम एक चैटबॉट या अवतार होता है जो भाषण के पैटर्न, व्यक्तित्व के लक्षणों और बातचीत की आदतों की नकल करता है, जिससे मृतक डिजिटल रूप से “अमर” दिखाई देता है.
इन तकनीकों का भावनात्मक आकर्षण स्पष्ट है, लेकिन कानूनी और नैतिक प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं. मुख्य चिंता यह है कि क्या कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद कानूनी रूप से अपनी पहचान का मालिक है? भारत और ऑस्ट्रेलिया सहित कई न्यायालयों में, कानून किसी व्यक्ति की आवाज़, चेहरे या व्यक्तित्व को स्पष्ट रूप से ‘संपत्ति’ के रूप में मान्यता नहीं देता है.
कॉपीराइट की सीमा: जबकि कॉपीराइट किताबों या फिल्मों की सुरक्षा करता है, यह किसी की उपस्थिति या बोलने के तरीके तक विस्तारित नहीं होता है. यदि AI किसी के जीवन के डेटा का उपयोग करके प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करता है, तो उस आउटपुट का मालिक कौन है वह व्यक्ति, उसका परिवार, या वह कंपनी जिसने एल्गोरिदम बनाया है?
भारत सीमित लेकिन विकसित होते सुरक्षा उपाय प्रदान करता है. हाल के वर्षों में, कई सार्वजनिक हस्तियों ने अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग से अपनी पहचान की रक्षा के लिए “पर्सनालिटी राइट्स” का आह्वान किया है. करण जौहर, ऐश्वर्या राय बच्चन, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ, सद्गुरु और अरिजीत सिंह जैसी हस्तियों ने ऐसी सुरक्षा प्राप्त करने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाया है. हालांकि, आम नागरिकों के लिए इसी तरह की कानूनी स्पष्टता अभी भी नदारद है.
प्रतिष्ठा को नुकसान: AI सिस्टम समय के साथ विकसित होते हैं. यदि एक डिजिटल ट्विन ऐसे विचार व्यक्त करना शुरू कर दे जो उसके मानव समकक्ष के पास कभी नहीं थे, या उनकी मृत्यु के वर्षों बाद अनुचित व्यवहार करे, तो जवाबदेही किसकी होगी?
मानसिक स्वास्थ्य: मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि मृत प्रियजनों के AI प्रतिनिधित्व के साथ नियमित बातचीत दुख (Grief) को कम करने के बजाय लंबा खींच सकती है. यह भावनात्मक निर्भरता पैदा कर सकता है और ‘क्लोजर’ (Closure) को और अधिक कठिन बना सकता है.
डेटा प्राइवेसी: यदि कोई कंपनी बंद हो जाती है या बिक जाती है, तो इस बात पर बहुत कम पारदर्शिता है कि किसी व्यक्ति के डिजिटल अवतार को कैसे ट्रांसफर या मॉनिटाइज्ड किया जाएगा.